भागलपुर का ‘जर्दालू आम’: GI टैग वाला शाही फल, जिसकी खुशबू से महक उठता है बिहार
जब
गर्मी चरम पर हो और आम की बात चले, तो
भागलपुर का नाम आते ही जुबां पर एक ही नाम आता है – जर्दालू। ये सिर्फ आम नहीं, बिहार की पहचान और शान है। 2018 में इसे GI टैग
मिला, और तब से ये आम से ‘ब्रांड’ बन गया। जर्दालू आम की पहचान हल्का नींबू-पीला रंग, साइज में छोटा – वजन सिर्फ 100 से 150
ग्राम। इसकी खासियत है तीखी-मीठी खुशबू। कहते हैं कि इसकी सुगंध दूर से ही बता
देती है कि जर्दालू आया है। गूदा रेशे-रहित, मलाईदार
और बेहद मीठा।
मिट्टी का कमाल: ये सिर्फ भागलपुर और आसपास की उपजाऊ जमीन में ही अपना असली
स्वाद-खुशबू पाता है। कहीं और उगाओ तो वो बात नहीं आती। जर्दालू आम का सीजन छोटा लेकिन दमदार होता है।
मई के आखिरी हफ्ते से जून के दूसरे हफ्ते तक ही ये बाजार में मिलता है। कुल 20-25 दिन। इसीलिए लोग इसका साल भर इंतजार करते हैं।
जून के पहले हफ्ते में ही भागलपुर से PM, राष्ट्रपति
और देश के बड़े गणमान्य लोगों को गिफ्ट के तौर पर जर्दालू भेजा जाता है।
GI
टैग
ने कैसे बदली किस्मत?
2018 में GI टैग मिलने के बाद जर्दालू की दुनिया बदल गई।पहचान: पहले सिर्फ बिहार
तक सीमित था, अब इंग्लैंड तक एक्सपोर्ट हो रहा
है।कमाई: GI टैग और सरकार की मदद से पैकेजिंग बेहतर
हुई, किसानों की आमदनी बढ़ी। ‘मैंगो
फेस्टिवल’ में पहले दिन ही ₹11
लाख के पौधे बिक गए। कभी राजा-महाराजाओं के लिए रिजर्व था, आज भी ‘स्टेट गिफ्टिंग’ में सबसे ऊपर।
खेती कहां और कितनी?
GI सर्टिफिकेशन में कुल 700 हेक्टेयर इलाका ‘जर्दालू एरिया’ घोषित है, जिसमें से 450
हेक्टेयर अकेले भागलपुर जिले में है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर इसकी ब्रांडिंग और मार्केटिंग में मदद कर
रहा है। सिर्फ जर्दालू ही नहीं, ‘मैंगो
मैन’ का कमाल , भागलपुर के अशोक चौधरी को ‘मैंगो मैन’
कहते हैं। जर्दालू के सबसे बड़े उत्पादक होने के साथ उन्होंने 100 से ज्यादा आम की किस्में विकसित की हैं।
जर्दालू
आम सिर्फ फल नहीं है। ये भागलपुर की मिट्टी, किसान
की मेहनत और बिहार के स्वाभिमान का प्रतीक है। छोटा साइज, कम दिन का सीजन, पर जो एक बार खा ले वो अगली गर्मी का इंतजार करने लगता है।अगर आपने
अब तक असली भागलपुरी जर्दालू नहीं चखा, तो
इस जून मौका मत छोड़ना। क्योंकि ये आम नहीं, ‘अनुभव’
है।
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